अपने जन्मजात टैलेंट को पहचानें, अपने भविष्य को सशक्त बनाएं
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अवसादग्रस्त भारत — बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति और हमारी ज़िम्मेदारी
आज भारत एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट से गुजर रहा है।
अवसाद (Depression) तेज़ी से बढ़ रहा है और इसके साथ ही आत्महत्या की घटनाएँ भी चिंताजनक रूप से बढ़ रही हैं।
हर दिन किसी न किसी परिवार में एक अनकही पीड़ा जन्म लेती है — क्योंकि किसी ने हिम्मत हार दी।
हमारे आसपास ऐसे लोग हैं जो सामान्य दिखते हैं, मुस्कुराते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर गहरी लड़ाई लड़ रहे होते हैं।
कई बार यह संघर्ष इतना भारी हो जाता है कि लोग इसे खत्म करने का रास्ता खोजने लगते हैं।
अवसाद क्यों बढ़ रहा है?
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अकेलापन और भावनात्मक दूरी
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आर्थिक या करियर का दबाव
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रिश्तों में तनाव
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सोशल मीडिया की तुलना
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असफलताओं का डर
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मानसिक स्वास्थ्य पर बात न कर पाने की आदत
सबसे खतरनाक बात यह है कि
अवसाद चुपचाप बढ़ता है — बिना शोर किए।
जो लोग सबसे ज़्यादा टूटे होते हैं, वे अक्सर सबसे शांत दिखाई देते हैं।
हम क्या कर सकते हैं?
हम सबके पास एक बहुत सशक्त हथियार है —
“पूछना”
हाँ… बस पूछना।
कभी-कभी किसी से “कैसे हो?” पूछना जीवन बचा सकता है।
क्योंकि जब कोई यह पूछता है “आप कैसे हैं?”
तो यह सिर्फ एक सवाल नहीं होता —
यह एक भावना होती है।
एक एहसास कि “आप अकेले नहीं हैं, कोई है जो आपकी परवाह करता है।”
इसलिए…
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जब किसी दोस्त से मिलें, उसका हाल ज़रूर पूछें।
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परिवार के सदस्यों से रोज़ एक बार दिल से बात करें।
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ऑफिस में किसी सहकर्मी का मूड खराब लगे तो उसे अनदेखा न करें।
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किसी का व्यवहार अचानक बदल जाए तो ध्यान दें।
हम किसी की पूरी ज़िंदगी तो नहीं बदल सकते,
लेकिन एक क्षण में उसे उम्मीद ज़रूर दे सकते हैं।
याद रखें:
कभी-कभी किसी के मरने पर नहीं,
उसके जीवित रहते हुए उसे बस थोड़ा सा सुने जाने की ज़रूरत होती है।
चलिये, आज से एक संकल्प लेते हैं:
आप जिससे भी मिलें… उसका हाल ज़रूर पूछें।
शायद आपका एक सवाल… किसी की ज़िंदगी बचा दे।